Friday, June 3, 2011

kafi dino se



k kafi dino se main yaha aa na saka
lagta hai mukaddar na chha he na tha
koshish to jarur ki
par uff iss ulfat nekuch isss kadar jakada
ki haal main bata na saku kisiko
main to kuch soch bhi na paya tha ki
khud ba khud dil se nikla
ki

"Palkon pe aanso'on ko saja na saka
Us ko bhi Dil ka haal bata na saka

Zakhmon se choor choor tha yeh Dil mera
Ek zakham bhi us ko dikha na saka,"

Thursday, June 2, 2011

kuch aisa lagta hai mujhe

kafi dino se khud ko khud se juda juda sa mehsooss kar raha hu.
lagta nai ki reh paunga iss jamee par aur jyada
par jab b sochta hu ki kya karna ab aur reh kar
kuch yaad aa jata hai purana sa
jo jane nai deta
yoooon lagta hai ki bas thehra sa hoon yadoon ke sahare
bas ab dar itana hai ki kahi koi thees na lag jae ki mai ulat padu
prakash.............

Thursday, March 5, 2009

ऐसी है यातनायें

यातनाएं
बदला कुछ भी नहींयह देह उसी तरह दर्द का कुआं है।इसे खाना, सांस लेना और सोना होता है।इस पर होती है महीन त्वचाजिसके नीचे ख़ून दौड़्ता रहता है।इसके दांत और नाख़ून होते हैं।इसकी हड्डियां होती हैं जिन्हें तोड़ा जा सकता है।जोड़ होते हैं जिन्हें खींचा जा सकता है।बदला कुछ भी नहीं।देह आज भी कांपती है उसी तरहजैसे कांपती थीरोम के बसने के पूर्व और पश्चात्।ईसा के बीस सदी पूर्व और पश्चात्यातनाएं वही-की-वही हैंसिर्फ़ धरती सिकुड़ गई हैकहीं भी कुछ होता हैतो लगता है हमारे पड़ोस में हुआ है।बदला कुछ भी नहीं।केवल आबादी बढ़ती गई है।गुनाहों के फेहरिस्त में कुछ और गुनाह जुड़ गए हैंसच्चे, झूठे, फौरी और फर्जी।लेकिन उनके जवाब में देह से उठती हुई चीखहमेशा से बेगुनाह थी, है और रहेगी।बदला कुछ भी नहींसिवाय तौर-तरीकों, तीज-त्यौहारों और नृत्य-समारोहों के।अलबत्ता मार खाते हुए सिर के बचाव में उठे हुए हाथ की मुद्रा वही रही।शरीर को जब भी मारा-पीटा, धकेला-घसीटाऔर ठुकराया जाता है,वह आज भी उसी तरह तड़पता ऐंठताऔर लहूलुहान हो जाता है।बदला कुछ भी नहींसिवाय नदियों, घाटियों, रेगिस्तानोंऔर हिमशिलाओं के आकारों के।हमारी छोटी-सी आत्मा दर-दर भटकती फिरती है।खो जाती है, लौट आती है।क़्ररीब होती है और दूर निकल जाती हैअपने आप से अजनबी होती हुई।अपने अस्तित्व को कभी स्वीकारती और कभी नकारती हुई।जब कि देह बेचारी नहीं जानतीकि जाए तो कहां जाए।
- विस्साव शिंबोर्स्का

ऐसी है यातनायें

यातनाएं
बदला कुछ भी नहींयह देह उसी तरह दर्द का कुआं है।इसे खाना, सांस लेना और सोना होता है।इस पर होती है महीन त्वचाजिसके नीचे ख़ून दौड़्ता रहता है।इसके दांत और नाख़ून होते हैं।इसकी हड्डियां होती हैं जिन्हें तोड़ा जा सकता है।जोड़ होते हैं जिन्हें खींचा जा सकता है।बदला कुछ भी नहीं।देह आज भी कांपती है उसी तरहजैसे कांपती थीरोम के बसने के पूर्व और पश्चात्।ईसा के बीस सदी पूर्व और पश्चात्यातनाएं वही-की-वही हैंसिर्फ़ धरती सिकुड़ गई हैकहीं भी कुछ होता हैतो लगता है हमारे पड़ोस में हुआ है।बदला कुछ भी नहीं।केवल आबादी बढ़ती गई है।गुनाहों के फेहरिस्त में कुछ और गुनाह जुड़ गए हैंसच्चे, झूठे, फौरी और फर्जी।लेकिन उनके जवाब में देह से उठती हुई चीखहमेशा से बेगुनाह थी, है और रहेगी।बदला कुछ भी नहींसिवाय तौर-तरीकों, तीज-त्यौहारों और नृत्य-समारोहों के।अलबत्ता मार खाते हुए सिर के बचाव में उठे हुए हाथ की मुद्रा वही रही।शरीर को जब भी मारा-पीटा, धकेला-घसीटाऔर ठुकराया जाता है,वह आज भी उसी तरह तड़पता ऐंठताऔर लहूलुहान हो जाता है।बदला कुछ भी नहींसिवाय नदियों, घाटियों, रेगिस्तानोंऔर हिमशिलाओं के आकारों के।हमारी छोटी-सी आत्मा दर-दर भटकती फिरती है।खो जाती है, लौट आती है।क़्ररीब होती है और दूर निकल जाती हैअपने आप से अजनबी होती हुई।अपने अस्तित्व को कभी स्वीकारती और कभी नकारती हुई।जब कि देह बेचारी नहीं जानतीकि जाए तो कहां जाए।
- विस्साव शिंबोर्स्का

ये प्यार है दोस्त

परछाइयाँ
जवान रात के सीने पे दूधिया आँचल मचल रहा है किसी ख्वाबे-मरमरीं की तरह हसीन फूल, हसीं पत्तियाँ, हसीं शाखें लचक रही हैं किसी जिस्मे-नाज़नीं की तरह फ़िज़ा में घुल से गए हैं उफ़क के नर्म खुतूत ज़मीं हसीन है, ख्वाबों की सरज़मीं की तरहतसव्वुरात की परछाइयाँ उभरतीं हैंकभी गुमान की सूरत कभी यकीं की तरहवे पेड़ जिन के तले हम पनाह लेते थेखड़े हैं आज भी साकित किसी अमीं की तरह इन्हीं के साए में फिर आज दो धड़कते दिल खामोश होठों से कुछ कहने-सुनने आए हैं न जाने कितनी कशाकश से कितनी काविश से ये सोते-जागते लमहे चुराके लाए हैंयही फ़िज़ा थी, यही रुत, यही ज़माना थायहीं से हमने मुहब्बत की इब्तिदा की थीधड़कते दिल से लरज़ती हुई निगाहों सेहुजूरे-ग़ैब में नन्हीं सी इल्तिजा की थीकि आरज़ू के कंवल खिल के फूल हो जायेंदिलो-नज़र की दुआयें कबूल हो जायें तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैंतुम आ रही हो ज़माने की आँख से बचकरनज़र झुकाये हुए और बदन चुराए हुएखुद अपने कदमों की आहट से, झेंपती, डरती,खुद अपने साये की जुंबिश से खौफ खाए हुए तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैंरवाँ है छोटी-सी कश्ती हवाओं के रुख परनदी के साज़ पे मल्लाह गीत गाता हैतुम्हारा जिस्म हर इक लहर के झकोले सेमेरी खुली हुई बाहों में झूल जाता है तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैंमैं फूल टाँक रहा हूँ तुम्हारे जूड़े मेंतुम्हारी आँख मुसर्रत से झुकती जाती हैन जाने आज मैं क्या बात कहने वाला हूँज़बान खुश्क है आवाज़ रुकती जाती है तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैंमेरे गले में तुम्हारी गुदाज़ बाहें हैंतुम्हारे होठों पे मेरे लबों के साये हैंमुझे यकीं है कि हम अब कभी न बिछड़ेंगेतुम्हें गुमान है कि हम मिलके भी पराये हैं। तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैंमेरे पलंग पे बिखरी हुई किताबों को,अदाए-अज्ज़ो-करम से उठ रही हो तुमसुहाग-रात जो ढोलक पे गाये जाते हैं,दबे सुरों में वही गीत गा रही हो तुम तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैंवे लमहे कितने दिलकश थे वे घड़ियाँ कितनी प्यारी थीं,वे सहरे कितने नाज़ुक थे वे लड़ियाँ कितनी प्यारी थींबस्ती को हर-एक शादाब गली, रुवाबों का जज़ीरा थी गोयाहर मौजे-नफ़स, हर मौजे सबा, नग़्मों का ज़खीरा थी गोयानागाह लहकते खेतों से टापों की सदायें आने लगींबारूद की बोझल बू लेकर पच्छम से हवायें आने लगींतामीर के रोशन चेहरे पर तखरीब का बादल फैल गयाहर गाँव में वहशत नाच उठी, हर शहर में जंगल फैल गयामग़रिब के मुहज़्ज़ब मुल्कों से कुछ खाकी वर्दी-पोश आयेइठलाते हुए मग़रूर आये, लहराते हुए मदहोश आयेखामोश ज़मीं के सीने में, खैमों की तनाबें गड़ने लगींमक्खन-सी मुलायम राहों पर बूटों की खराशें पड़ने लगींफौजों के भयानक बैंड तले चर्खों की सदायें डूब गईंजीपों की सुलगती धूल तले फूलों की क़बायें डूब गईंइनसान की कीमत गिरने लगी, अजनास के भाओ चढ़ने लगेचौपाल की रौनक घटने लगी, भरती के दफ़ातर बढ़ने लगेबस्ती के सजीले शोख जवाँ, बन-बन के सिपाही जाने लगेजिस राह से कम ही लौट सके उस राह पे राही जाने लगेइन जाने वाले दस्तों में ग़ैरत भी गई, बरनाई भीमाओं के जवां बेटे भी गये बहनों के चहेते भाई भीबस्ती पे उदासी छाने लगी, मेलों की बहारें ख़त्म हुईआमों की लचकती शाखों से झूलों की कतारें ख़त्म हुईधूल उड़ने लगी बाज़ारों में, भूख उगने लगी खलियानों मेंहर चीज़ दुकानों से उठकर, रूपोश हुई तहखानों मेंबदहाल घरों की बदहाली, बढ़ते-बढ़ते जंजाल बनीमहँगाई बढ़कर काल बनी, सारी बस्ती कंगाल बनीचरवाहियाँ रस्ता भूल गईं, पनहारियाँ पनघट छोड़ गईंकितनी ही कंवारी अबलायें, माँ-बाप की चौखट छोड़ गईंइफ़लास-ज़दा दहकानों के हल-बैल बिके, खलियान बिकेजीने की तमन्ना के हाथों, जीने ही के सब सामान बिकेकुछ भी न रहा जब बिकने को जिस्मों की तिजारत होने लगीख़लवत में भी जो ममनूअ थी वह जलवत में जसारत होने लगी तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैंतुम आ रही हो सरे-आम बाल बिखराये हुयेहज़ार गोना मलामत का बार उठाये हुएहवस-परस्त निगाहों की चीरा-दस्ती सेबदन की झेंपती उरियानियाँ छिपाए हुए तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैंमैं शहर जाके हर इक दर में झाँक आया हूँकिसी जगह मेरी मेहनत का मोल मिल न सकासितमगरों के सियासी क़मारखाने मेंअलम-नसीब फ़िरासत का मोल मिल न सका तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैंतुम्हारे घर में क़यामत का शोर बर्पा हैमहाज़े-जंग से हरकारा तार लाया हैकि जिसका ज़िक्र तुम्हें ज़िन्दगी से प्यारा थावह भाई 'नर्ग़ा-ए-दुश्मन' में काम आया है तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैंहर एक गाम पे बदनामियों का जमघट हैहर एक मोड़ पे रुसवाइयों के मेले हैंन दोस्ती, न तकल्लुफ, न दिलबरी, न ख़ुलूसकिसी का कोई नहीं आज सब अकेले हैं तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैंवह रहगुज़र जो मेरे दिल की तरह सूनी हैन जाने तुमको कहाँ ले के जाने वाली हैतुम्हें खरीद रहे हैं ज़मीर के कातिलउफ़क पे खूने-तमन्नाए-दिल की लाली है तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैंसूरज के लहू में लिथड़ी हुई वह शाम है अब तक याद मुझेचाहत के सुनहरे ख़्वाबों का अंजाम है अब तक याद मुझेउस शाम मुझे मालूम हुआ खेतों की तरह इस दुनियाँ मेंसहमी हुई दोशीज़ाओं की मुसकान भी बेची जाती हैउस शाम मुझे मालूम हुआ, इस कारगहे-ज़रदारी मेंदो भोली-भाली रूहों की पहचान भी बेची जाती हैउस शाम मुझे मालूम हुआ जब बाप की खेती छिन जायेममता के सुनहरे ख्वाबों की अनमोल निशानी बिकती हैउस शाम मुझे मालूम हुआ, जब भाई जंग में काम आयेसरमाए के कहबाख़ाने में बहनों की जवानी बिकती हैसूरज के लहू में लिथड़ी हुई वह शाम है अब तक याद मुझेचाहत के सुनहरे ख्वाबों का अंजाम है अब तक याद मुझेतुम आज ह्ज़ारों मील यहाँ से दूर कहीं तनहाई में या बज़्मे-तरब आराई मेंमेरे सपने बुनती होगी बैठी आग़ोश पराई में।और मैं सीने में ग़म लेकर दिन-रात मशक्कत करता हूँ, जीने की खातिर मरता हूँ,अपने फ़न को रुसवा करके अग़ियार का दामन भरता हूँ।मजबूर हूँ मैं, मजबूर हो तुम, मजबूर यह दुनिया सारी है, तन का दुख मन पर भारी है,इस दौरे में जीने की कीमत या दारो-रसन या ख्वारी है।मैं दारो-रसन तक जा न सका, तुम जहद की हद तक आ न सकीं चाहा तो मगर अपना न सकींहम तुम दो ऐसी रूहें हैं जो मंज़िले-तस्कीं पा न सकीं।जीने को जिये जाते हैं मगर, साँसों में चितायें जलती हैं, खामोश वफ़ायें जलती हैं,संगीन हक़ायक़-ज़ारों में, ख्वाबों की रिदाएँ जलती हैं।और आज इन पेड़ों के नीचे फिर दो साये लहराये हैं, फिर दो दिल मिलने आए हैं,फिर मौत की आंधी उट्ठी है, फिर जंग के बादल छाये हैं,मैं सोच रहा हूँ इनका भी अपनी ही तरह अंजाम न हो, इनका भी जुनू बदनाम न हो,इनके भी मुकद्दर में लिखी इक खून में लिथड़ी शाम न हो॥सूरज के लहू में लिथड़ी हुई वह शाम है अब तक याद मुझेचाहत के सुनहरे ख्वाबों का अंजाम है अब तक याद मुझे॥हमारा प्यार हवादिस की ताब ला न सका,मगर इन्हें तो मुरादों की रात मिल जाये।हमें तो कश्मकशे-मर्गे-बेअमा ही मिली,इन्हें तो झूमती गाती हयात मिल जाये॥बहुत दिनों से है यह मश्ग़ला सियासत का,कि जब जवान हों बच्चे तो क़त्ल हो जायें।बहुत दिनों से है यह ख़ब्त हुक्मरानों का,कि दूर-दूर के मुल्कों में क़हत बो जायें॥बहुत दिनों से जवानी के ख्वाब वीराँ हैं,बहुत दिनों से मुहब्बत पनाह ढूँढती है।बहुत दिनों में सितम-दीद शाहराहों में,निगारे-ज़ीस्त की इस्मत पनाह ढूँढ़ती है॥चलो कि आज सभी पायमाल रूहों से,कहें कि अपने हर-इक ज़ख्म को जवाँ कर लें।हमारा राज़, हमारा नहीं सभी का है,चलो कि सारे ज़माने को राज़दाँ कर लें॥चलो कि चल के सियासी मुकामिरों से कहें,कि हम को जंगो-जदल के चलन से नफ़रत है।जिसे लहू के सिवा कोई रंग रास न आये,हमें हयात के उस पैरहन से नफ़रत है॥कहो कि अब कोई कातिल अगर इधर आया,तो हर कदम पे ज़मीं तंग होती जायेगी।हर एक मौजे हवा रुख बदल के झपटेगी,हर एक शाख रगे-संग होती जायेगी॥उठो कि आज हर इक जंगजू से कह दें,कि हमको काम की खातिर कलों की हाजत है।हमें किसी की ज़मीं छीनने का शौक नहीं,हमें तो अपनी ज़मीं पर हलों की हाजत है॥कहो कि अब कोई ताजिर इधर का रुख न करे,अब इस जा कोई कंवारी न बेची जाएगी।ये खेत जाग पड़े, उठ खड़ी हुई फ़सलें,अब इस जगह कोई क्यारी न बेची जायेगी॥यह सर ज़मीन है गौतम की और नानक की,इस अर्ज़े-पाक पे वहशी न चल सकेंगे कभी।हमारा खून अमानत है नस्ले-नौ के लिए,हमारे खून पे लश्कर न पल सकेंगे कभी॥कहो कि आज भी हम सब अगर खामोश रहे,तो इस दमकते हुए खाकदाँ की खैर नहीं।जुनूँ की ढाली हुई ऐटमी बलाओं से,ज़मीं की खैर नहीं आसमाँ की खैर नहीं॥गुज़श्ता जंग में घर ही जले मगर इस बार,अजब नहीं कि ये तनहाइयाँ भी जल जायें।गुज़श्ता जंग में पैकर जले मगर इस बार,अजब नहीं कि ये परछाइयाँ भी जल जायें॥
- साहिर लुधियानवी

कवितायें तुम्हारे लिए

किताब
हैरत है।अक्षर नहीं हैं आज किताब परकहाँ चले गए अक्षरएक साथ अचानक?सबेरे सबेरेकाले बादल उठ रहे हैं चारों ओर सेमैली बोरियां ओढ़कर सड़क की पेटियों परगंदगी के पास सो रहे हैं बच्चेहस्पताल के बाहर सड़क मेंभयानक रोग से मर रही है एक युवतीपैबन्द लगे मैले कपड़ों मेंहिमाल में ठंड से बचने की प्रयास में कुलीएक और प्रहर के भोजन के बदलेखुदको बेच रहे हैं लोग ।मैं एक एक करके सोच रहा हूँ सब दृश्यचेतना को जमकर कोड़े मारते हुए,खट्टा होते हुए, पकते हुएखो रहा हूँ खुद को अनुभूति के जंगल में ।कितना पढूँ ? बारबार सिर्फ किताब समय को टुकडों में फाड़करमैं आज दुःख और लोगों के जीवन को पढूंगा ।अक्षर नहीं हैं किताब पर आज।
- भीष्म उप्रती

Tuesday, December 2, 2008