किताब
हैरत है।अक्षर नहीं हैं आज किताब परकहाँ चले गए अक्षरएक साथ अचानक?सबेरे सबेरेकाले बादल उठ रहे हैं चारों ओर सेमैली बोरियां ओढ़कर सड़क की पेटियों परगंदगी के पास सो रहे हैं बच्चेहस्पताल के बाहर सड़क मेंभयानक रोग से मर रही है एक युवतीपैबन्द लगे मैले कपड़ों मेंहिमाल में ठंड से बचने की प्रयास में कुलीएक और प्रहर के भोजन के बदलेखुदको बेच रहे हैं लोग ।मैं एक एक करके सोच रहा हूँ सब दृश्यचेतना को जमकर कोड़े मारते हुए,खट्टा होते हुए, पकते हुएखो रहा हूँ खुद को अनुभूति के जंगल में ।कितना पढूँ ? बारबार सिर्फ किताब समय को टुकडों में फाड़करमैं आज दुःख और लोगों के जीवन को पढूंगा ।अक्षर नहीं हैं किताब पर आज।
- भीष्म उप्रती
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