Thursday, March 5, 2009

ऐसी है यातनायें

यातनाएं
बदला कुछ भी नहींयह देह उसी तरह दर्द का कुआं है।इसे खाना, सांस लेना और सोना होता है।इस पर होती है महीन त्वचाजिसके नीचे ख़ून दौड़्ता रहता है।इसके दांत और नाख़ून होते हैं।इसकी हड्डियां होती हैं जिन्हें तोड़ा जा सकता है।जोड़ होते हैं जिन्हें खींचा जा सकता है।बदला कुछ भी नहीं।देह आज भी कांपती है उसी तरहजैसे कांपती थीरोम के बसने के पूर्व और पश्चात्।ईसा के बीस सदी पूर्व और पश्चात्यातनाएं वही-की-वही हैंसिर्फ़ धरती सिकुड़ गई हैकहीं भी कुछ होता हैतो लगता है हमारे पड़ोस में हुआ है।बदला कुछ भी नहीं।केवल आबादी बढ़ती गई है।गुनाहों के फेहरिस्त में कुछ और गुनाह जुड़ गए हैंसच्चे, झूठे, फौरी और फर्जी।लेकिन उनके जवाब में देह से उठती हुई चीखहमेशा से बेगुनाह थी, है और रहेगी।बदला कुछ भी नहींसिवाय तौर-तरीकों, तीज-त्यौहारों और नृत्य-समारोहों के।अलबत्ता मार खाते हुए सिर के बचाव में उठे हुए हाथ की मुद्रा वही रही।शरीर को जब भी मारा-पीटा, धकेला-घसीटाऔर ठुकराया जाता है,वह आज भी उसी तरह तड़पता ऐंठताऔर लहूलुहान हो जाता है।बदला कुछ भी नहींसिवाय नदियों, घाटियों, रेगिस्तानोंऔर हिमशिलाओं के आकारों के।हमारी छोटी-सी आत्मा दर-दर भटकती फिरती है।खो जाती है, लौट आती है।क़्ररीब होती है और दूर निकल जाती हैअपने आप से अजनबी होती हुई।अपने अस्तित्व को कभी स्वीकारती और कभी नकारती हुई।जब कि देह बेचारी नहीं जानतीकि जाए तो कहां जाए।
- विस्साव शिंबोर्स्का

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